नींद, कैंसर, कोरोना और ज़िंदगी!

यशवंत

चीन हमारे वक्त का सबसे महत्वाकांक्षी और सबसे ताकतवर मुल्कों में से एक है. उनने अब दूसरे देशों में अपने लोगों को नागरिकता दिलवा कर वहां की स्थानीय औरत से ब्याह करने और फिर आधे चीनी बच्चे पैदा करने की कवायद शुरू कर दी है. अफ्रीका समेत कई देशों में चीनियों को नागरिकता दी जाने लगी है. ये चीनी नागरिक वहां की स्थानीय औरतों से शादी रचा बच्चे पैदा कर रहे जो आधे चीनी मूल के होते हैं. यानि ये बच्चे चीन के होंगे. चीन के प्रति साफ्ट कार्नर रखेंगे. चीनी मूल के कहलाएंगे. इन बच्चों के कंधे पर सवार चीन पूरी दुनिया को अपना बना लेने की रणनीति बनाए है.

याद करिए ओशो रजनीश वाला वो अध्याय जिसमें वो अमेरिका में रजनीशपुरम वाले अपने आश्रम के गैर-अमेरिकी अनुयाइयों को अमेरिकी महिलाओं से शादी कर वहां की नागरिकता हासिल करने को प्रेरित करते थे. ओशो एक व्यक्ति थे. अमेरिका ने उन्हें नेस्तनाबूत कर दिया. ओशो की प्रसिद्धि और ओशो की बढ़ती ताकत अमेरिकी सिस्टम को रास न आ रही थी. सो, अमेरिका ने अपने तरीके से ओशो के मठ उजाड़ कर उन्हें खदेड़ने में सफलता पाई. इसके लिए उसे कई किस्म की चालें चलनी पड़ीं.

ओशो को गिरफ्तार करना पड़ा. डराया धमकाया गया और जेल में सड़ा देने वाला अंजाम दिखाया गया. ओशो लौट आए भारत. पर चीन तो एक बड़ा देश है.

चीन की महत्वाकांक्षा पूरी दुनिया को अपने झंडे तले लाने की है. चीन ने गरीब देशों में अपने नागरिकों को बसा कर वहां स्थानीय महिलाओं से शादी रचाकर आधे चीनी मूल के बच्चे पैदा कराने की जो रणनीति बनाई है, इसके बहुत दूरगामी परिणाम होने वाले हैं. एक रोज ऐसा होगा कि हर मुल्क में चीन के झंडाबरदार होंगे. हर मुल्क के शीर्षस्थ पदों पर चीनी मूल के लोग होंगे. यानि दुनिया चीन की मुट्ठी में!

चीन आर्थिक ताकत में सबसे जबर है. चीन जनसंख्या में सबसे जबर है. चीन अपने मूल के लोगों के वैश्विक फैलाव में सबसे जबर बनना चाहता है ताकि एक रोज उसके लोग हर जगह हों और हर जगह उसके लोगों के कब्जे में हो. यह विश्व विजेता बनने की सबसे महत्वाकांक्षी चाल है.

चीन ने अर्थव्यवस्था, सैन्य ताकत, अंतरिक्ष, टेक्नालजी, डिजिटलाइजेशन आदि अत्याधुनिक क्षेत्रों में सबसे आगे निकल गया है. वह प्रकृति से टक्कर लेने लगा है. वह ऐसी ऐसी परियोजनाएं बना चुका है जिसे बनाना असंभव माना जाता रहा है. चीन ने तर्क, विज्ञान, तरक्की और ताकत को इस कदर खुद में संयोजित कर चुका है कि उसे कोई मात देने वाला है ही नहीं.

पर सबका एक वक्त होता है. अहंकार की हार होती है. सबसे ताकतवर व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन वह खुद होता है. वह अपनी गल्तियों से मरता है. चीन ने प्रकृति को जो चैलेंज देते हुए सर्वाधिक तेज गति से खुद का जो चौतरफा एक्सपेंशन अभियान चला रखा था, विश्व विजेता बनने का जो सपना पाल रखा था, उस पर ब्रेक लगा दिया प्रकृति ने. कोरोना वायरस ने ऐसा नाच नचाया चीनियों को कि उन्हें समझ नहीं आ रहा, क्या करें, क्या ना करें.

चीन ने सब कुछ पाया. पर एक चीज न पा सका. एक चीज पर ध्यान न दे सका. धरती की संवेदना को समझने का संस्कार. चीनियों की हाल की कई तस्वीरें व वीडियो लोगों में खूब वितरित हो रही हैं. चमगादड़ से लेकर सांप तक खा रहे हैं. सूप पी रहे हैं इन जीवों के. इनके जिस वुहान प्रदेश से कोरोना वायरस का प्रकोप फैला, वहां की मीट मार्केट के बारे में कहा जाता है कि वहां कौन सा जानवर नहीं बिकता. कौन-सा जीव नहीं खाया जाता. चीनियों ने अपनी संवेदना को तो सर्वोच्च रखा पर दूसरे जीवों की संवेदना को कुछ न समझा. इस धरती पर जीव, जानवर, घास-फूस, मिट्टी, हवा, जल, समुद्र सब कुछ इंटर कनेक्टेड हैं, आपसी रूप से जुड़े गुंथे हुए हैं.

चीन इस धरती की संवेदना को न समझ सका. वे विज्ञान के सच को ही आखिरी मानते रहे. विज्ञान बहुत सारे क्षेत्रों में अभी शिशु लेवल पर है. जैसे अंतरिक्ष और ब्रह्मांड को ही समझने के बारे में ले लीजिए. चीन हो या अमेरिका, सभी ब्रह्मांड को समझने, इस ब्रह्मांड से उस ब्रह्मांड तक पहुंचने, धरती जैसी दूसरी जगहों को खोजने, डार्क मैटर को जानने समेत बहुत सारे मामलों में बिलकुल शिशु लेवल पर हैं. सो, हमें अतीत के उन कुछ गैर-विज्ञानी संस्कारों, समझ, सोच को भी समझना चाहिए, इनका आदर करना चाहिए जो मनुष्य व धरती के होने के मायने बताते हुए बाकी जीवों, वनस्पतियों से कैसा व्यवहार करें, यह सिखाते हैं.

धर्मों ने दुनिया का बहुत नुकसान किया है, ये सच है. पर यह भी सच है कि धर्मों ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को एक अनुशासन में बांधे रक्खा है. बहुत सारे धर्मों में जीव हत्या और मांसाहार निषेध है. इस नियम के पीछे जरूर एक बड़ी संवेदनशीलता, बड़ी उदात्तता है जिसमें सबसे सरवाइवल को सही माना समझा गया है. पर हम अब धार्मिक न रह गए. धर्म अब भीड़ को भेड़ बनाने के काम आने लगा है. धर्म अब सत्ता और शासन के औजार बन गए हैं. धर्म अब आतंकवाद के रास्ते पर उतर गए हैं. धर्म अब उदात्त की जगह कट्टरपंथी हो गए हैं. ये धर्मों का अमानवीयकरण है. पर सबसे खतरनाक बात जो हुई है, वह चीन जैसे देशों के कारण हुई. इनने सब कुछ खाद्य मान लिया. क्या सांप, क्या नेवला, क्या चूहा, क्या कुत्ता, क्या चमगादड़… सब खा जाओ.

इस ‘सब खा जाओ अभियान’ का अंजाम एक न एक दिन देखने को मिलना था. जीवों का सूप और जीवों का भोजन इस कदर आपस में गड्डमगड्ड हुए कि कोरोना वायरस का संक्रमण चीन में महामारी बन गया. लोग चलते फिरते गिरने मरने लगे. देखते ही देखते आपातकाल लागू हो गया. सब घरों में कैद हो गए. कोई किसी से मिलने को तैयार नहीं. कोई किसी के यहां जाने को तैयार नहीं. हर कोई दूसरे को शक से देख रहा कि ये अगला आदमी संक्रमित तो नहीं.

इस महामारी ने चीन की कमर तोड़ने का अभियान शुरू कर दिया है. इस एक महामारी से चीन की आर्थिक ताकत, उद्योग, व्यापार को तगड़ा झटका लगा है. अभी आज की ही खबर है नोएडा से. चीनियों का प्रतिनिधिमंडल आया था आटो एक्सपो में. 22 लोग आए थे चीन से. कोरोना वायरस के चक्कर में इन सभी को लौटाया जा रहा है.

चीन में कंपनियां अपना कारोबार समेट रही हैं. कुछ आर्थिक विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यही समय है जब भारत की मंदी मारी इकानामी उठान पर जा सकती है. वायरस ग्रस्त चीन सदमें में हैं. कुछ भी न कर पाने की स्थिति में है. वह केवल कोरोना वायरस से बचाव में लगा हुआ है. ऐसे में भारत के व्यापारी और भारत के खरीदार अपने देश में आर्थिक सक्रियता दिखाएं तो मार्केट चमक सकता है. ये तो हो गया मौका का फायदा लेना. पर हम बात कर रहे हैं संवेदना की.

चीन के कोरोना वायरस के बहाने एक बड़ा संदेश चुपचाप हर जगह पसर रहा है. इसके निहितार्थ को पकड़ने की जरूरत है. कैंसर, एड्स जैसे भयावह रोग पश्चिम की उपज हैं. कोरोना चीन से आया है. भारत जैसे गरीब विकासशील देश केवल अनुकरण करना जानता है. देखादेखी हम भी सब कुछ खाने की ओर चल पड़े हैं. हमने स्वर्निमित खाने की जगह डिब्बाबंद और प्लास्टिक में पैक खाने को तरजीह देना शुरू कर दिया है. हमने जीवन में न्यूनतम अनुशासन को भी ताक पर रखकर पश्चिम शैली की परम चरम अराजक जीवन शैली अपना ली है. ड्रग, सेक्स, शराब और पार्टी हमारे जीवन का सबसे बड़ी उपलब्धि बनती जा रही है. ऐसे में कैंसर, कोरोना, एड्स से सब ज्यादा दूर नहीं हैं.

कैंसर की आज की रिपोर्ट देखिए. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि हर दस में से एक भारतीय होगा कैंसर पीड़ित. हर पंद्रह में से एक पीड़ित कैंसर से मर जाएगा. कल भी अपन लोग कैंसर की चर्चा किए थे. उसका लिंक नीचे है. कैंसर हम लोगों को चौतरफा घेर रहा है. हम तब तक अनजान बने रहते हैं जब तक वह हम लोगों को जकड़ न चुका हो. फिर हम बस मौत से एक बनावटी युद्ध, एक हारा हुआ युद्ध लड़ने लगते हैं और एक दिन शहीद हो जाते हैं.

मौत से डर नहीं लगना चाहिए क्योंकि मौत उतना ही सच है जितनी ज़िंदगी. मौत की झलक हम रोज देखते हैं. नींद में. नींद छोटी मौत ही होती है. इस छोटी मौत से हम जब उबरते, उठते हैं तो कितने तरोताजा होते हैं. एकदम रिफ्रेश. उर्जा से भरपूर. ये छोटी मौत हमें अगले पंद्रह बीस घंटे तक चलने फिरने जीने की उर्जा देती है. इसे बॉडी चार्जिंग भी कह सकते हैं. हम सोते हुए खुद को चार्जिंग पर लगाए होते हैं. हम जब खुद को डेड मोड में रखते हैं तो हम चार्ज होने लगते हैं. चार्जिंग कंप्लीट होते ही हम एक्टिव मोड में आ जाते हैं.

मौत दरअसल नई जिंदगी की शुरुआत है. हम अपने शरीर रूपी जिस डिवाइस को बार बार चार्ज करते हैं, रोज रोज, मौत उस डिवाइस को नष्ट कर देता है. फार्मेट कर देता है. रिसाइकल कर देता है. रिप्लेस कर देता है. गीता वाला वो श्लोक सबको पता होगा जिसमें कहा जाता है कि आत्मा नहीं मरता. नैनं छिदंति…. देह जो आत्मा का केंचुल है, वह उतर जाता है. तो, मौत, मरना, मर जाना चिंता का विषय नहीं होना चाहिए. चिंता का विषय हमारा इस धरती को न समझना है. हमारा खुद को न समझना है. जब हम खुद को समझ जाते हैं, इस धरती को समझने की कोशिश करते हैं तो दरअसल हम मौत को समझ चुके होते हैं. भयों से उठ चुके होते हैं.

आज नींद मेरी टूटी तो एक सपने से उठा. आंख बंद कर सपने को रिपीट करता रहा. उसके बारे में सोचता रहा. मैं सपने में एक शासक था. गांजा पीकर शासन कर रहा था. अजीब अजीब फैसले सुना रहा था. मैं सपने में ही यह कह रहा था कि गांजा पीकर सबसे अच्छे से शासन किया जा सकता है. नींद में सपना. सपने में राजा. राजा के पास गांजा. ये कौन सी दुनिया है नींद और सपने की. मुझे हंसी आई जगकर. थोड़ा ये मन सा भी हुआ कि अगर सपने में आज गांजा मारा है तो आज दिन में जगकर कहीं से गांजा जुगाड़ते हैं, पीते हैं. पर बात आई गई हो गई. अब किसी नशे के प्रति कोई चार्म नहीं रहा. नशे की अतियों को जी चुका. अब मुझे मध्यम मार्ग समझ में आने लगा है. अगर हम खुद को उदात्त बनाए रखें, सहज किए रहें, पानी जैसा निश्छल, सबमें ढल जाने वाला व्यक्तित्व बनाए रखें तो एक रोज हम अपनी कमियों, गल्तियों से सीखते सीखते वहां पहुंच जाते हैं जहां जाने होने की हमने कभी उम्मीद न की होगी.

नींद में जीना सीख रहा हूं. जगे हुए में कैंसर और कोरोना से लड़ना. ज़िंदगी को समझना है तो खुद को न समझिए, दूसरों के प्रति संवेदनशील होइए. जो हममें है वही सबमें है. ये मेरा तेरा वाला बंटवारा जगे होने का बंटवारा है वरना सोए हुए जीव तो सब एक-सी दुनिया में तैर रहे होते हैं. समूह में उत्सव मना रहे होते हैं. जगी हुई अवस्था में दूसरों को दीजिए, दूसरों को समझिए, दूसरों को महसूसिए, दूसरों से प्रेम करिए, दूसरों को गले लगाइए. कहीं कुछ नहीं रक्खा है इस संसार में. सब बनावटी भेद है. चींटी हो या सांप, कबूतर हो या आदमी. सबमें तू ही तू.

जैजै

-स्वामी भड़ासानंद यशवंत

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3 thoughts on “नींद, कैंसर, कोरोना और ज़िंदगी!

  1. प्रकृति के साथ अन्याय तो पूरी दुनिया मे हो रहा है जिसका विस्फोट भी किसी दिन हो सकता है ,लेकिन चीन के नवधनाढ्य परिवार इस कदर परेशान हो गए कि कुछ नया करने की उनकी कोशिश खत्म नही होती,एक तो अन्य देशों की कोई खबर नही ,दूसरे आपस मे सिर्फ पड़ोसी जितना ही बहस करो, दिमाग इतना रोबोटिक होता है कि मानवाधिकार की समंझ ही नही
    अब मनोरंजन का एक पहलू खानपान भी होता है और उसमे अगर नई नई चीज़ों पर एक्सपेरिमेंट करते हैं तो रोमांचक भी लगता है ,इसलिए अचानक से विलुप्ति की तरफ जा रहे जानवर से लेकर समुद्री कीड़े तक सब खा जाने का रोमांच उन्हें प्रोत्साहित कर रहा है ,
    वायरस की धरती चीन अब सिर्फ खुद को बचाने की कबायद करे तो ज्यादा सही रहेगा ,बजाय विस्तारवादी नीति को आगे करे

  2. बहुत सुंदर लेख आप को नियमित पढ़ना चाहता हूं सब्सक्राब का कोई तरीका सुझाए

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