तेरी कारीगरी पर फ़िदा हूं दोस्त…

पेड़ पत्ती फूल आसमान धूप हवा
तेरी कारीगरी पर फ़िदा हूं दोस्त
इनसे अलग भला मेरा वजूद कहाँ

उपरोक्त तस्वीर को फेसबुक पर ”आजकल मेरी हालत ऐसी है” शीर्षक से डाला तो तरह तरह के कमेंट्स की बाढ़ आ गई. कमेंट व लाइक के लिए शुक्रिया. हंसने, मजाक मानने और मुझको मजाक समझने के लिए भी शुक्रिया. असल में यह तस्वीर देखकर मेरे दिमाग में जो बात तत्काल आई उसे आपके सामने रखना चाहता हूं.. जो इस प्रकार है….

हरे-भरे खेत-खलिहान, बाग-बगीचे, नदी-तालाब, फूल-पौधे, तारे-आसमान सब छोड़कर जब हम कहीं दूर चल पड़े तो कंकड़-पत्थर, धुआं-प्रदूषण, शोर-अशांति, भागमभाग-भीड़, एक खास किस्म के जानवरों यानि आदमियों की रेलमपेल के बीच फंस गए और उसमें जिंदा बचे रहने के लिए जो संघर्ष शुरू हुआ, उसका कोई अंत नहीं… हर दिन कुछ नष्ट होते जाने, कमजोर होते जाने, हारते जाने का भाव मन में बढ़ता गया…

हम मनुष्यों ने खूब विकास किया है, खूब तरक्की की है वाले डायलाग के उलट इस दुनिया का सबसे ज्यादा नुकसान हम मनुष्यों ने किया है.. और ऐसी स्थिति बना दी है कि सिर्फ हम मनुष्य ही नहीं, हर गैर-मनुष्य भी खुद के सरवाइवल को लेकर असुरक्षित, संघर्षरत, बीमार महसूस करने लगा है…

मैं चेतन हूं, गाड पार्टिकल हूं, आपमें हूं, आपसे इतर जो जिंदा हैं उनमें भी हूं. उनमें भी हूं जो जड़ है और स्थिर है.. सब मिलजुल कर मैं हूं, और यह मैं कोई एक नहीं पूरा ब्रह्रांड है, जिसके अनंत छोटे छोटे मैं यहां वहां जहां तहां बिखरा हुआ है…

इसलिए मैं इस स्कूटर में भी हूं, बकरी में भी हूं, मिट्टी में भी हूं, पत्ती में भी हूं, आपमें भी हूं, खुद में भी हूं…

हम फंसे हुए लोग अक्सर महसूस नहीं कर पाते कि हम फंसे हुए हैं क्योंकि कई बार फंसना इतना स्थायी और जन्मना होता है कि हम फंसने को ही सहज-स्वाभाविक मान लेते हैं…

चलिए, मेरे हाल पर हंसिए… पर जरा गौर से देखिए,, कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हाल मेरा है, वही हाल तेरा है… 🙂

स्वामी भड़ासानंद यशवंत

March 14, 2017

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