भगवानों संतों महात्माओं मनीषियों को पढ़ने भर से आंतरिक यात्रा शुरू नहीं हो जाती…

मार्क्स को पढ़ने भर से कोई लेनिन या माओ नहीं बन जाता. क्रांति के जरिए व्यस्था बदल देने वाले लेनिन और माओ ने मार्क्स को खूब पढ़ा-समझा लेकिन मार्क्स के दर्शन को कट्टरपंथी की तरह फालो नहीं किया, जैसे भारतीय मूर्ख कम्युनिस्टों ने किया. लेनिन और माओ ने मार्क्स की आत्मा को समझा और उसे अपने देश समाज काल परिस्थिति के हिसाब से विकसित रूपांतरित परवर्तित संशोधित समायोजित परिमार्जित कर लागू किया. इसी कारण ये दोनों शख्स अपने अपने देशों रूस और चीन में क्रांति करने में सफल हो सके. व्यवस्था को उखाड़ फेंकने में कामयाब हो सके.

ठीक उसी तरह सिर्फ राम, कृष्ण, कबीर, बुद्ध, महावीर आदि भगवानों संतों महात्माओं मनीषियों को पढ़ने भर से आंतरिक यात्रा शुरू नहीं हो जाती. मोक्ष के रास्ते पर चल पड़ना संभव नहीं हो जाता. ओशो ने अपने बेहिसाब किताबों भाषणों प्रवचनों के जरिए धर्म अध्यात्म संतई जीवन आनंद प्रेम आदि की जो व्याख्याएं की हैं, वो अदभुत व अनमोल है. आप एक ओशो को इकट्ठे पढ़ सुन लें तो आपको अलग अलग कई सज्जनों को पढ़ने सुनने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा. लगेगा प्यास तो यहीं पूरी हो गई. सबके सब एक जगह ही मिल गए.

यही कारण है कि मैं ओशो को आजकल दुबारा खूब पढ़ रहा हूं. पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन की पढाई के लिए जब पहुंचा था, तब ओशो से किताबों के जरिए संपर्क हुआ था और उनसे जुड़ाव का सिलसिला लंबा चला. ओशो बेमिसाल हैं. लेकिन ओशो के आगे भी जाना है. आगे जाने का मतलब ओशो को पछाड़ना नहीं. ओशो से होड़ लेना नहीं. ओशो ने जिस रास्ते को चलने लायक बनाया, कंकड़ पत्थर मिट्टी गिट्टी सब तोड़ ताड़ समतल किया, उस रास्ते पर चलते हुए आगे उस पहाड़ पर चढ़ने की तैयारी करना जिसके लिए ये सारे रास्ते तैयार किए गए, इतनी सारी तैयारी की गई. ओशो ने ध्यान मेडिटेशन पर जितना काम किया है, वह नाकाफी है. वह शुरुआती है. वह वर्णनात्मक ज्यादा है, वह उत्सवधर्मी ज्यादा है, वह गेटटूगेदर सा है. वह भयग्रस्त भीड़ का समूह में इकट्ठा होकर आत्मविश्वास हासिल करने का प्रयास सा लगता है. गलत बिलकुल नहीं है. बस शुरुआत है. वह प्रथम मंजिल का प्रारंभ है. लेकिन दुर्भाग्य या दुख ये है कि इसी प्रथम मंजिल तक ओशो भक्त पहुंचकर चरम अवस्था तक पहुंचना समझ लेते हैं.

सच कहूं तो ये प्रथम मंजिल, ये प्रथम चरण आपको खुद ब खुद मिल जाता है, अकेले ही, जब आप चैतन्य हो जाते हैं, चाहने की इच्छा से भर जाते हैं, पूर्ण-सा महसूस करने लगते हैं. इस कवायद में आप चाहें जितना नाच गा लें, ध्यान कर लें, उल्लास से भर जाएं. आगे की यात्रा शुरू नहीं होती, बस आप पहले चरण को ही जीते रह जाते हो. आगे के चरण ऐसे हैं जिससे डर लगेगा प्रथम चरण वालों को. मृत्यु, दुख, अंधेरे के साथ जीते हुए आप जीवन, सुख, प्रकाश को महसूस करने लगेंगे. लेकिन यह इतना सामान्य, वर्णनात्मक नहीं है, जितना यहां मैं कह बता पा रहा हूं. यह सपने में पहाड़ से गिरने जैसा है भी और नहीं भी. तो कैसा है यह?

… बताउंगा. थोड़ा वक्त लगेगा. जरूर बताऊंगा. पर क्या आप इसे सिर्फ सुनना जानना चाहते हैं या जीना भी 🙂

स्वामी भड़ासानंद यशवंत

5 सितंबर 2015

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