जब आप सायास निष्प्रयोज्य जीवन जी रहे हों तो उन क्षणों में परमात्मा के सबसे करीब होते हैं

नोएडा के भड़ास आश्रम में बाबा 🙂

नोएडा के भड़ास आश्रम से बाबा भड़ासानंद यशवंत का प्रवचन आप भी झेलें… आजकल नोएडा सेक्टर 70 में एक मित्र द्वारा बनवाए गए भड़ास आश्रम में हूं. क्या खूब जगह है. लग ही नहीं रहा कि दिल्ली एनसीआर के धूल भीड़ शोर में हूं. बेहद शांत और हरा भरा इलाका.

हवादार और नेचुरल रोशनी से चमक रहे एक कमरे का यह फ्लैट एक अधिकारी मित्र ने इसलिए बनवाया ताकि उनके मित्र लोग आकर रुक सकें. सो, इसका नामकरण मैंने ‘नोएडा का भड़ास आश्रम’ कर दिया है. परसों से यहां दोस्तों का आना जाना खाना गाना बजाना लगा हुआ है. सबको फोन कर बोल दिया था- ‘आओ रे, हम यहां पर हूं’.

एक दिन रात को यह पकाया गया…

आज बिलकुल अकेले हूं. शोर के बाद शांति जरूरी / मजबूरी हो जाती है. उद्देश्य, लक्ष्य, मकसद, मंजिल नामक शब्दों के साथ कई दशकों तक जीते जीते अब इनसे उलट निरुद्देश्य जीवन जीने में कितना असीम आनंद आ रहा है, कितना सार्थक वाइब्रेशन फील हो रहा है, यह मैं महसूस कर रहा हूं.

जब आप निष्प्रयोज्य जीवन जी रहे हों और बिना वजह कुछ कर रहे हों तो उन क्षणों में आप परमात्मा के सबसे करीब होते हैं, यह महसूस करने लगा हूं. दिल्ली आता हूं तो चार छह जरूरी कामों की लिस्ट बनाकर लाता हूं लेकिन यहां आकर सब कामधाम भूल जाता हूं. खुद से ही सवाल पूछने लगता हूं कि ये काम हो भी जाए तो क्या, न भी हो तो क्या… दुनियादारी से दिन प्रतिदिन बढ़ती दूरी बड़ी सुखद से सुंदरतम होती जा रही है. लाखों करोड़ों की बातें चीजें प्रस्ताव आसपास होते रहते हैं / आते रहते हैं पर उसके प्रति आकर्षण / लालसा अब उतनी नहीं रही. संचय संग्रह के प्रति पहले भी बहुत अनिच्छा थी.

मेरा क्या है जो मेरे पास ही रहे? कुछ नहीं… हम बेवजह चीजों को अपने इर्दगिर्द अपने कब्जे में समेटकर रखना चाहते हैं जबकि असल में कुछ भी हमारे वश कब्जे में नहीं होता.. छोड़ते फेंकते देते जाइए और देखिए, दिन प्रतिदिन उदात्ततम होते जाएंगे…

जीवन जीने की न्यूनतम जरूरत क्या है… एक किलो आटा, आधा किलो आलू, सौ ग्राम तेल, पचास ग्राम नून. बस. कहीं पका लो. कहीं झोपड़ी बनाकर रह लो. इस धरती पर हम लोगों के लिए इतना काफी होना चाहिए क्योंकि ये धरती सिर्फ मनुष्यों की नहीं है. हम मनुष्यों ने अपने विस्तार अपनी लिप्सा अपनी वासनाओं के लिए लाखों करोड़ों अरबों प्रजातियों को धरती से खदेड़ दिया, नष्ट कर दिया. जिधर देखो उधर आदमी… आदमी उदरस्थ करता जा रहा है यह धरती. धरती की विविधता और सौंदर्यबोध को लेकर जो पाठ हम सभी को जीवन के शुरुआत में ही पढ़ाया सिखाया बताया अनुभव कराया जाना चाहिए, ऐसा कुछ नहीं. हम केवल एक ही चीज बढ़ाते बताते सिखाते और खुद जीते हैं, वो है पैसा. और, ये पैसा हमें मनुष्य नहीं रहने देता. हमें मानवीय नहीं होने देता. हमें उदात्त नहीं होने देता. हमें शांत नहीं रहने देता.

इस बेजान से रुपये पैसे में इतनी जान है कि हम लाखों करोड़ों प्रजातियों की जान ले चुके हैं और पूरी धरती को निगलने में लगे हैं और बरास्ते यूं हम खुद को शूली पर बिना वजह शहीद बनाने के लिए चढ़ा देते हैं…. हम अपने लिए नहीं जीते हैं. हम बेटे, पत्नी, परिवार आदि इत्यादि का नाम ले लेकर खुद का जीवन तो नष्ट कर ही डालते हैं, उन्हें भी पिंजरे का बुलबुल बनाकर छोड़ते हैं. प्रकृति को सूक्ष्मतम गहनतम रूप में देखें तो समझ आएगा कि हर प्रजाति में सरवाइवल के लिए जो स्ट्रगल, जो दुख सुख झेलना पड़ता है, उसी के जरिए उस प्रजाति के श्रेष्ठतम / बेस्ट सामने आ पाते हैं. लेकिन हम चाहते हैं हमारे अपने हमारे प्रिय लक्ष्मण रेखा के भीतर ही रहें ताकि उन्हें कोई दुख न पहुंचे. कोई अहित न हो जाए. पर इससे होता उलटा है. उनकी आंतरिक ताकत विकसित नहीं हो पाती. उनकी उदात्तता, उनकी समझ, उनका ब्रेन विकसित नहीं हो पाता. वो बाहर से भले गोल मटोल सुंदर सुरक्षित दिखें पर उनका आंतरिक अविकसित और विकलांग रह जाता है. तो, एक जीवन पैसा विहीन. एक आंदोलन पैसे के खिलाफ. एक पाठ अर्थ की राजनीति और समाजशास्त्र को लेकर.. एक समझ जीवन के प्रति बेहद जरूरी है.

लंबा हो गया. झेलना मुश्किल होगा. इसलिए विराम. और, प्रणाम. लीजिए ये एक मेरा पसंदीदा कबीर भजन….

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

बाल अवस्था खेल गवांयो ।
जब यौवन तब मान घना रे ॥

लाहे कारण मूल गवाँयो ।
अजहुं न गयी मन की तृष्णा रे ॥

कहत कबीर सुनो भई साधो ।
पार उतर गये संत जना रे ॥

बीत गये दिन भजन बिना रे ।
भजन बिना रे भजन बिना रे ॥

स्वामी भड़ासानंद यशवंत

जुलाई 28, 2016

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