सड़क छाप जीवन में चिरकुट राग!

Yashwant Singh : कल की रात. सड़क छाप. चिरकुट राग.

एक भाईसाब चुपचाप कूड़ा बीनते हैं. मयूर विहार फेज दो की मार्केट के आगे पीछे दाएं बाएं शांत एकांत में पड़े कूड़े से रोजाना बातें करते हैं. घंटा दो घंटा. इस मेहनत से रोजाना अधिकतम पचास रुपये कमा लेते हैं. बोतल, दवा, कागज टाइप की बेकार मानकर फेंकी गई चीजों को सहेज संभाल कर. वो ये काम अपने परिवार और पड़ोसियों के चोरी-छिपे करते हैं. वो लोअर मिडिल क्लास फेमिली वाले हैं. मंडवाली-कल्याणपुरी साइड की बस्ती में रहते हैं. उन्हें सरप्राइज दिया. ज्यादा नहीं, बस पचास रुपये नगद. और थोड़ी जादू की झप्पी. गले लगाकर. हग डे मनाकर.

यूं ही कूदते फांदते कार दौड़ाते एक बाजार से गुजरे तो एक सज्जन कूड़ा इकट्ठा कर उसे आग बनाए हुए थे. कार रोक तुरंत हाथ सेंकने में जुट गए. झाड़ू वाले भाईसाब भी खड़े हो गए, लगे मुझे ध्यान से देखने कि इस आग में खास बात क्या है. उन्हें भी बिठाकर आग तपाया और कहा कि जब भी ठंढक में कहीं आग लगाइए, उसकी आंच ताप को पूरे भाव से मन मिजाज तक पहुंचाइए. वो बेचारे कुछ सोचते कुछ पूछने की मुद्रा बनाते आग तापने बैठ गए. वो बैठ गए तो मैं चल दिया.

सरप्राइज पर याद आया कि एकबार मैं मेरठ गया हुआ था. वहां सड़क छाप खाने-पीने की ठेले वाली दुकानों के बगल में कार लगाकर दारू पीने का कार्यक्रम शुरू हुआ. एक लड़का ठेले वाले की तरफ से आर्डर लेने आया. लड़को को मैं ध्यान से देखता रह गया. बेहद सुशील. सलीके से पहना हुआ कपड़ा. विनम्रता से बातें करते हुए. पूछ बैठा कि पढ़ते हो यही वेटरगिरी का ही काम करते हो. बोला- पढ़ता हूं सर. यहां दो चार घंटा कर लेता हूं तो कुछ पैसे मिल जाते हैं पाकेट मनी के. वो बताने लगा अपने मां-पिता की गरीबी के बारे में. मैंने फौरन पाकेट से हजार का नोट निकाला और थमाते हुए कहा- बेटा, चाहे जो मुश्किल आ जाए, पढ़ना जरूर. ज़िंदगी तुम्हारे संघर्षों से जरूर तुम्हें सुखद सबक देगी. वो हजार का नोट लेने में हिचकिचा रहा था. बोला- सर ये ज्यादा है, बहुत ज्यादा है, दस बीस पचास लोग दे देते हैं. एकदम से हजार कैसे ले लूं. मैंने उससे कहा- बेटा, इसे चमत्कार मान, सरप्राइज मान, और रख ले. पैसा किसी के बाप का नहीं. ये तेरा मेरा हम सबका है. मुझे किसी ने दिया. मैंने तुझे दिया. हिसाब बराबर. हां, मुझे ये देते हुए संतुष्टि का भाव है कि सही जगह दे रहा.

चमत्कार-सरप्राइज पर एक छोटा किस्सा और याद आया. मयूर विहार फेज दो के पाकेट सी स्थित अपने घर में जब देर रात तन डोले मन डोले की अवस्था से लौट रहा था, कार पार्क करने के बाद तो बेहद शांत माहौल में किसी के रोने जैसी धीमी आवाज आई. पैर ठिठक गए. देर तक आवाज नहीं आई. चलने को हुआ तो फिर रुवांसी आवाज आई. मैं रुक गया और कान आवाज की तरफ कर लिया. थोड़ी देर बाद फिर आवाज आई तो लगा कि कोई संकट में है. आवाज की दिशा की तरफ मुखातिब हुआ तो पता चला कि केंद्र बिंदु नाला है. कालोनी के गेट पर विशाल कूड़ाघर से सटे हुए नाले से आवाज आ रही थी. ध्यान से नाले में देखा तो पता चला कि एक कुत्ता फंसा हुआ है और निकल पाने की सारी जद्दोजहद के बाद थक हारकर धीमी गति का विलाप कर रहा है. मैंने उसे बेटा बच्चा प्यारे का संबोधन देते हुए पुचकारा तो उसकी जान में जान सी आती दिखी. उसका आधा शरीर नाले के पानी में था और आधा पानी से उपर. नाले की गहराई काफी थी, इसलिए वह निकल नहीं पा रहा था. मैंने अपने दाएं बाएं देखा. सड़क के इस पार उस पार नजर फिराया. कहीं कोई आदमी नहीं. कूड़ाघर में से थोड़ी हलचल आ रही थी. उधर गया तो दो तीन आदमी कूड़े बीनते दिखे. मैंने उनसे बताया कि मेरा कुत्ता नाले में गिर गया है, उसे निकाल दो और बदले में ये सौ सौ रुपये ले लो. दोनों आदमी कूड़ाघर वाला अपना काम छोड़ नाले की तरफ आए और अंदर देखकर कहा कि साहब ये कुत्ता आपका ही है न, ऐसा न हो कि काट ले. मैंने कहा- सौ फीसदी मेरा है. खोजते खोजते अभी यहां आया हूं. इसके बिना नींद नहीं आ रही और ये न निकलेगा तो मैं भी इसी में कूद जाउंगा. दोनों आदमी एक दूसरे की तरफ देखने लगे और फिर उनमें से एक बोला. साहब पांच सौ रुपये लगेंगे. मैंने तुरंत कहा- डन. और उन्हें पांच सौ का नोट थमा दिया. एक अंदर घुसा. दूसरा उपर से सहयोग करने लगा. कुत्ते को पकड़कर एक ने उपर उठाया और दूसरे ने टांग पकड़कर खींच लिया. कुत्ता बाहर निकल कर ऐसे भागा जैसे उसे जाने किस संकट से मुक्ति मिल गई हो. मैं जोर से चिल्लाया- अरे साले थैंक्यू तो बोल के जा रे बे.. पांच सौ रुपये तेरे चक्कर में गए… मैं घर लौटा और वो दोनों शख्स अपने कूड़ाघर.

ऐसे कई किस्से हैं रात की आवारगी के.

सुबह उठता हूं तो सोचता हूं कि काफी पैसे उड़ा दिए. पर बाद में लगता है कि उड़ाए नहीं हैं. उसे सही जगह पहुंचाया हूं.

हमारे आपके छोटे थोड़े से एफर्ट से कई लोगों के चेहरे खिल जाते हैं. उन्हें अच्छे लोगों के होने पर यकीन आ जाता है.

वरना ज़िंदगी तो सबे जी रहे हैं, अपने अपने शरीर, परिवार और दरो-दीवार पर रंग-रोगन करने-कराने की तमाम चिंताओं-दुश्चिंताओं के साथ…

तो भाइयों सड़क छाप चिरकुटई है पूरा चमत्कार.

इस चमत्कार को नमस्कार.

जै जै

12 February 2014 को फेसबुक पर प्रकाशित.

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