पूजा भी कोई नियम थोड़े ही है! पूजा प्रेम है… जब आता है, आता है…

रामकृष्ण पूजा करते थे। पुजारी थे दक्षिणेश्वर में। उनको पुजारी रखकर बड़ी भूल हो गई। क्योंकि वे ठीक पुजारी थे, और ठीक पुजारी की मंदिरों में क्या जरूरत? मंदिर तो नौकर-चाकर चाहते हैं, पेशेवर पुजारी चाहते हैं। वे पुजारी थे। पेशेवर नहीं थे, वही अड़चन हो गई। जब उनको रख लिया था, तब तो किसी को अंदाज न था कि कितना बड़ा आविर्भाव होने वाला है इस आदमी में। रखकर बड़ी झंझट हो गई।

जिसने रखा था उनको दक्षिणेश्वर के मंदिर में, वह रानी रासमणि थी। बड़ी धनाढय महिला थी। रानी का उसे पद था, लेकिन शूद्र थी। इसलिए कोई ब्राह्मण मंदिर में पुजारी बनने को राजी न था। सिर्फ रामकृष्ण राजी हो गए। भक्त को क्या शूद्र, क्या ब्राह्मण! और भगवान भी कहीं शूद्र और ब्राह्मण के अलग होते हैं! और मंदिर भी कहीं शूद्र और ब्राह्मण का होता है! मंदिर भगवान का। कोई ब्राह्मण राजी न था। क्षुद्रतम ब्राह्मण राजी न थे। ऐसे ब्राह्मण भी राजी न थे, जो मरघट में मुर्दो के कपड़े भी स्वीकार कर लेते हैं, वे भी राजी न थे। शूद्र का मंदिर! उसमें कौन पूजा करेगा? कौन भ्रष्ट होगा? इसलिए रामकृष्ण जब राजी हो गए तो रानी रासमणि ने स्वीकार कर लिया।

कुछ ढंग के तो नहीं मालूम पड़ते थे। कुछ खोए-खोए लगते थे। आंखें कहीं और थीं। बात यहां करते, चित्त कहीं और था। मगर कोई मिलता नहीं था। सोचा, थोड़ा पगला है, जैसा है, काम चलेगा। मंदिर बिना पुजारी के तो हो नहीं सकता।फिर रानी रासमणि खुद पूजा नहीं कर सकती थी, शूद्र थी। तो रामकृष्ण पुजारी हो गए।

कुल चौदह रुपए महीने उनकी तनख्वाह थी, लेकिन अड़चन शुरू हो गई, ट्रस्टी मुश्किल में पड़ गए। जल्दी ही ट्रस्टियों को बैठक बुलानी पड़ी, कि यह तो भूल कर ली, इससे तो खाली मंदिर बेहतर! क्योंकि कभी तो पूजा दिन भर चलती और कभी दो मिनट में पूरी हो जाती! कभी मिनट नहीं लगता, और कभी पूजा होती ही नहीं! कभी दिन बीत जाते और रामकृष्ण का कोई पता ही नहीं! और कभी-कभी दिन भर! सुबह से शुरू होती तो रात हो जाती है, घंटा बजता ही रहता, वे नाचते रहते, पूजा ही करते रहते!रामकृष्ण से कहा, यह क्या मामला है? उन्होंने कहा, पूजा भी कोई नियम थोड़े ही है! कोई व्यवस्था से पूजा होती है। पूजा प्रेम है। जब आता है, आता है। यह तो हवा का झोंका है; आया, आया। लाने का क्या उपाय है? जब आ जाता है, जितनी देर टिकता है, टिकता है। हटाने का भी क्या उपाय है? कोई घड़ी से चल सकती है पूजा कि घंटा हो गया! पुरोहित, व्यवसायी पुरोहित घंटे से चलता है, घड़ी से चलता है, हृदय से तो नहीं।

रामकृष्ण कहते, जब आती है तो आती है। नहीं आती, नहीं आती। फिर तो और अड़चन आनी शुरू हुई। इस तक के लिए भी वे राजी हो गए, क्योंकि कोई दूसरा ब्राह्मण मिलता नहीं था। कम से कम कभी-कभी तो होती है! और फिर यह आदमी इकट्ठा भी कर लेता है। एक दिन इतनी कर देता है कि समझो सप्ताह भर न भी करे तो चलेगा।लेकिन फिर अड़चन हुई, क्योंकि पता चला कि यह जो भोग लगाता है, पहले खुद अपने को लगा लेता है। पहले मिठाई खुद चख लेता है, फिर प्रतिमा को रख देता है। यह तो बड़ा जघन्य पाप है। परमात्मा को जूठा भोजन चढ़ाना! पहले परमात्मा को चढ़ाओ, फिर अपने को ले सकते हो। कहा रामकृष्ण से; तो रामकृष्ण ने कहा, सम्हालो तुम्हारी नौकरी। हम से न होगी। मुझे पता है, मुझे प्रेम के शास्त्र का पता है। मेरी मां मेरे लिए जब भी कुछ देती थी तो पहले चखकर देती थी। मेरी मां तक को इतना पता है, तो क्या मुझे कुछ पता नहीं? बिना चखे मैं नहीं दे सकता। पता नहीं देने योग्य हो भी, या न हो? बिना चखे पक्का क्या है, कि ये देने योग्य था? भगवान को दे रहा हूं, चखकर ही दूंगा। दुनिया में ऐसा पुजारी न तो पहले हुआ, न फिर पीछे हुआ। यही पुजारी है लेकिन। यह जो धुन है . . .

और रामकृष्ण जब पूजा करते तो रोते। रोना ही पूजा है। भक्त कुछ जानता नहीं।रामकृष्ण ने अपने शिष्यों को कहा है, क्या करोगे तुम साधना? जब छोटा बच्चा जोर से रोता है, तो मां भागी चली जाती है। बस, तुम रोना सीख लो। जब तुम रोओगे, वह भागा चला आएगा। न आए तो समझना, कि रोना अभी पूरा नहीं हुआ। अभी तुम ऐसे ऊपर-ऊपर से रो रहे हो। अभी तुम्हारे प्राण का संयोग नहीं मिला। अभी तुम रोना ही नहीं हो गए हो। रुदन तुम्हारी आत्मा नहीं बना है। छोटा बच्चा भी जानता है बिना सिखाए। कहीं योग सीखने जाता है छोटा बच्चा, कि जब मां को बुलाना है तो क्या करना? चीखता है, चिल्लाता है, रोता है, आंसू बहने लगते हैं। मां भागी चली आती है। हजार काम छोड़कर चली आती है। परमात्मा को होंगे हजार काम, रामकृष्ण कहते, तुम रोओ भर, उसको आना ही पड़ेगा।कुछ और करने की भक्त को जरूरत नहीं।

भक्ति कठिन है और सरल भी। कठिन इसलिए कि रोने को तुम साध तो नहीं सकते। आएगा तो आएगा, कठिन इसलिए। सरल इसलिए कि सिर्फ रोने से सब हो जाता है। पतंजलि के योगशास्त्र की जरूरत नहीं। बस, आंसुओं का शास्त्र तुम समझ लो, सब हो जाता है।

मेरा मुझमें कुछ नहीं- ओशो

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