मेरी बेचैनियां मेरी सम्वेदना-समझ को समृद्ध करती हैं।

कल एकमित्र का फोन आया। पूछे, क्या कुछ आप बेचैन, अस्थिर से हैं क्या? मैंने कुबूल किया, हां। बेचैन भी हूँ। अस्थिर भी हूँ।

मित्र मुझसे प्रेम करते हैं इसलिए उनका सवाल डर भय लाजिमी था। चालीस पचास की उमर तक आते आते आदमी जीने का फाइनल तर्क तरीका कल्टीवेट कर लेता है और फिर एक ढर्रे पर चलने लगता है, दिन रात व्यतीत करने लगता है। वह समाज मनुष्य जीवन दुनिया को लेकर एक फाइनल धारणा राय नजरिया बना चुका होता है। वह ठीक ठीक जान समझ लिया होता है कि उसे क्या करना है क्या नहीं करना है।

मेरे साथ थोड़ी दिक्कत है। मैं जो धारणाएं बनाता हूँ, वह फूल प्रूफ नहीं होतीं। नए फीडबैक मिलने समझने पर वो धारणाएं मोडिफाई हो जाती हैं अपग्रेड हो जाती हैं या खारिज हो जाती हैं। मेरी दुनिया ब्रम्हांड जीव जगत व खुद को लेकर समझ बहुत नाजुक, अधूरा व संवेदनशील है। यह अधूरापन कभी भर नहीं पाता। जिस दिन भर लूंगा, उस दिन हम भी एक लीक पर चल देंगे। उस दिन से हम भी सोचना समझना दिमाग लगाना बंद कर देंगे। आंख नाक कान सब बन्द कर लेंगे। कोल्हू के बैल की तरह एक फिक्स रुट पर एवें ही चक्रमण करते रहेंगे और एक दिन निपट जाएंगे।

हाँ, मेरी बेचैनियां मेरी सम्वेदना-समझ को समृद्ध करती हैं। मेरी मानसिक अस्थिरता से अनुभवों के खजाने में नई समझ नए तर्क उपजते हैं। चलने दीजिए। बहने दीजिए। मरने दीजिए। जिन डूबा तिन पाईयाँ…
<3

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