क्या मनुष्यता त्याग कर ज्यादा बड़े कैनवस में शरीक होने का वक्त आ चुका है!

…मनुष्य से बड़ा कमीना, धूर्त, चालबाज, मक्कार, विध्वंसक, स्वार्थी और पाखंडी दूसरी कोई मुंह-हाथ-पैर-पेट वाली प्रजाति नहीं….

…इसलिए मैं खुद को मनुष्य की जगह जानवर, चिड़िया, पंछी, कीड़ा, मकोड़ा आदि प्रजाति में से किसी एक में शामिल करने पर विचार कर रहा हूं…

…तदनुसार अपना धर्म ‘मनुष्यता’ को त्यागकर ‘जानवता’ या ‘चिड़ियाता’ या ‘किड़किड़ाता’ या ‘चहचहाता’ या ‘रेकियाता’ या ‘रेंगियाता’ में से कोई एक अपनाने पर विचार कर रहा हूं….

…और, आप लोगों से अपील करूंगा कि दुनिया के विध्वंस, मनुष्यों के शोषण, जानवरों के खात्मे, जंगल के विनाश, हाथियों के वन विहीन वास, शेरों के जंगल विहीन जीवन, मुर्गों-बकरों के लिए लगातार व सामूहिक उत्सवी कत्लेआम, पर्यावरण के जीवन विरोधी होने के लिए जिम्मेदार मनुष्यों की प्रजाति से इस्तीफा देकर खुद को कोई जानवर या पंछी या चिड़िया या पौधा मान लें, और उसी प्रजाति के हिसाब से जीवन गुजारें….

…मनुष्य के चक्कर और चंगुल में किसी भी रूप (वैचारिक, मानसिक, शारीरिक, सांस्कृतिक) रूप में फंसेंगे तो समझिए कि आपके जीवन का अपव्यय तय है….

…मनुष्य व मनुष्यता के चंगुल में फंसने वाले लोग सदा हींग खाई मुर्गी की तरह बेहद कनफ्यूज भाव से यत्र-तत्र डोलते बकते जीते रहते हैं… और उन्हें खुद समझ नहीं आता कि वे जी डोल बक क्यों रहे हैं…

…मनुष्यों का बनाया वैचारिक जाल जंजाल इतना तगड़ा है कि इससे शायद ही कोई मनुष्य निकल कर मनुष्य व मनुष्यता के निहित स्वार्थी चिंतन से परे उठकर ब्रह्मांड के बुनियादी भावना का एहसास कर पाता है…. क्योंकि मनुष्य ने मनुष्यों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि दो तिहाई से ज्यादा तो पापी पेट के ऐंठन से उबर नहीं पाते, इसी से उर्जा पाते और इसी में होम हो जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को न्याय दिलाने और बचाने के चक्कर में बाकी गैर-मनुष्यों का नाश कर जाते हैं.. बाकी बचे लोग मनुष्य को जानवर मानकर उनका भरपूर शोषण व सत्यानाश करते हैं… बाकी बचे लोग मनुष्य मनुष्य कहकर अपनी दुकान चलाते हैं और इस दुकान से होने वाली यश अर्थ पद नुमा लाभ से अपना जीवन सफलता पूर्वक संचालित करते रहते हैं…

…कुछ एक बकचोद, फकीर, नागा, पियक्कड़, गपोड़ी, ऐबी, बनुच्चर, पागल, आलसी, एकांतवासी, असामाजिक, अमानवीय टाइप लोग जीवन के असली दर्शन को बूझ भी जाते हैं तो वे किसी को बता नहीं पाते, या बताना ही नहीं चाहते क्योंकि उनके लिए कोई उनके जैसा श्रोता दर्शक पाठक ही नहीं मिल पाता…. या फिर संभवतः ये भी कि जो चरम सच को, असली मर्म को बूझ जाता है वो खुद में मगन रहता है, उसे किसी और को बताने समझाने का काम उचित नहीं लगता क्योंकि मनुष्य तो निहित स्वार्थी मनुष्यता में पागल है और बेचारे ढेर सारे गैर-मनुष्य तो इन्हीं हरामी मनुष्यों के मारे-सताए हैं…. या फिर ये भी कि जो मनुष्यों के दल दलदल से इस्तीफा देकर जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ पाया हो तो फिर वह भला निहित स्वार्थी मनुष्य को क्यों बताए, समझाए.. क्योंकि चालाक व धूर्त मनुष्य को बताने का मतलब है वह मनुष्य आपकी भी फोटो लगाकर मंदिर बनाकर पूजा शुरू कर देगा और इस तरह ढेर सारे मनुष्यों को फांसने बांधने लूटने का एक और उपक्रम शुरू कर देगा…

और ये भी कि जीवन ब्रह्मांड का सच बूझ लेना वाला प्राणी आखिरी सच को किसी गैर-मनुष्य को अच्छे से कनवे कर पाएगा, बिना शब्द के ही, क्योंकि जहां सहजता और उदात्तता है, वहां सब कुछ संप्रेषणीय है.. पर मनुष्य के यहां कहां है सहजता.. वह सहजता भी मनुष्यता के इर्दगिर्द है जो बाकियों के लिए गैर-मनुष्यों के लिए, प्रकृति के लिए असहजता और असंवेदनशीलता का कारण बनता है…

जय हो…

Share:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *