केंचुल उतरने की प्रक्रिया का सुख दुःख महसूसना

कुछ नए बदलावों को महसूस कर रहा हूँ। खुद के भीतर। बाहर की दुनिया के प्रति बहुत मामूली जुड़ाव लगाव द्वेष राग शेष है। अंदर की यात्रा शुरू हो गई है। जैसे कोई बीज वर्षों से यूँ ही पड़ा हो और अब अचानक वो धरती से बाहर निकलने को मचल रहा हो।

न आगे दौड़ पड़ने की ख्वाहिश है न पीछे बीते हुए को पकड़े रहने ज़िद। जिस क्षण में हूँ उसी संग प्रवाहित होने की कोशिश है। पहले भागने की सोचता था। पहले गुरु की तलाश में परेशान था। अब सब नियति पर छोड़ दिया है। जाहे विधि राखे राम। लालसाएं कामनाएं इच्छाएं पक कर टपकने लगी हैं। अब कैसे किससे क्यों संवाद करूँ। जो खुद ब खुद मिल रहा है वो अद्भुत अव्यक्त है।

कई साल लगे हैं इस बदलाव के उस छोर से इस छोर तक पहुँचने में। कई सालों में कई बार मरा हूँ, डरा हूँ। केंचुल उतरने की प्रक्रिया का सुख दुःख महसूसा है। अपनी अवधारणाएं, अपने आग्रह, अपना नजरिया, अपनी खुद की मूर्ति तोड़ छोड़ पाना बहुत मुश्किल काम होता है।

अब विराट असीम से एकाकार का वक़्त शुरू हुवा है। ये कोई कहने बताने समझाने की चीज नहीं। पर अभी नयी यात्रा का शिशु हूँ तो हरकतें कुछ न कुछ करूँगा ही। विदेह होने का सुख समझाया नहीं जा सकता। और, विदेह होना कोई ठान लेने से नहीं हुवा जाता। इन्द्रियजन्य और मानवजन्य अनंत जाल हैं जिसमें फंसे रहने को अभिशप्त हैं हम, ख़ुशी ख़ुशी।

ये शायद प्रकृति प्रभु असीम ब्रम्हांड की कृपा हो जो नयी यात्रा पे चल पड़ने का प्रसाद मिला है। आप सभी नए पुराने मित्रों का आभार। प्यार। आप उदात्त सन्दर्भ में सब कुछ लें। मगन रहें, जो कुछ भी करें, अच्छा या बुरा 🙂

जो क्षुद्र के लिए प्यासा होता है, वह क्षुद्र को पाकर भी आनंद उपलब्ध नहीं करता। और जो विराट के लिए प्यासा होता है, वह उसे न भी पा सके, तो भी आनंद से भर जाता है। If the desire is for something insignificant, there will be no joy even if you get it; but if you long for the significant, the ultimate and you don’t get it, then you will be filled with joy even if you don’t get it. -ओशो

स्वामी भड़ासानंद यशवंत

3 सितंबर 2015

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