नशे से कौन बच सका है..

ना सोना साथ जाएगा ना चांदी जाएगी… सत्ता, धन, ताकत, शोहरत, राजपाट, सिंहासन से लंबे समय तक लैस रहने वालों का अंजाम भी तो वही हुआ जो सबसे निर्धन का हुआ.. अटल जार्ज जेटली सुषमा पर्रिकर देशमुख सिंधिया राजीव इंदिरा… गिनते जाइए.. सब गए… अपनी अपनी इच्छाओं, अपनी अपनी सहमतियों के बगैर… इस दुनिया में आने वाले कई किस्म के नशे से लैस होकर आते हैं…

पैसा, सत्ता, सेक्स, पॉवर, नाम, करियर, सेलिब्रिटी स्टेटस के नशे से कौन बच सका है.. जो बच पाए वो दुनिया जी पाए, दुनिया समझ पाए, खुद को तलाश पाए… वे भटक कर नहीं मरे… मुझे दुनियावी करियर, दुनियावी शोहरत, धन… ये सब नहीं चाहिए यार…

बाहरी यात्राएं यानि दुनियावी दौड़ आपको समृद्धि सत्ता शोहरत सिंहासन राजपाट के चरम पर ले जा सकती हैं लेकिन आपको आंतरिक सुख-सुकून न दे पाएंगी… बेचैन ही रहेंगे..

इसके उलट आंतरिक यात्राएं आपको हर वक्त की संतुष्टि, सहजता और सुंदरता प्रदान कर देती हैं, बशर्ते आंतरिक यात्रा करने की कला आपने ठीक से सीखी हो और इसे जीवनचर्या का पार्ट बना लिया हो…

राजनीतिक विषयों पर कम से कम लिखने का तय किया हुआ है, क्योंकि सबसे आसान विषय होता है राजनीति पर लिख मारना..

राजनीति को दुनियावी वासना भर मानना चाहिए. इससे निजात बहुत कम लोग पा सकते हैं. प्रकृति जैसे बहुत सारी विविधताओं बहुत सारे औजारों के जरिए अपने राजपाट को आगे पीछे करते हुए संचालित करती रहती है, उसमें से एक राजनीति भी है… प्रकृति को समझ ही तब पाएंगे जब उसके औजारों / उसकी विविधताओं को गहरे से समझते हुए उससे पार पा लेने की कूव्वत हासिल कर लेंगे…

यह पार पाना और गहरे समझने का आशय न तिरस्कार से है और न मोह-माया से है… यह प्यार भी नहीं है…

यह केवल खुद के उदात्ततम होने और उदात्ततम में खुद के होने भर को समझने जैसा है…

जैजै

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