हमेशा प्रसन्न नहीं रहा जा सकता…

हमेशा प्रसन्न नहीं रहा जा सकता… हमेशा दुखी नहीं रहा जा सकता… हां, हमेशा निर्लिप्त रहा जा सकता है, दुखों-सुखों से, और ऐसे ढेर सारे इमोशंस से..

पर बड़ा मुश्किल होता है लगातर निर्लिप्त रहने की अवस्था में पहुंच पाना…

यह निर्लिप्तता का बोध-भाव यूं ही नहीं मिल जाया करता… वक्त लगता है… जीवन गुजर जाता है पर यह बोध नहीं मिल पाता क्योंकि चेतना का स्तर भावुकता के पैरामीटर से उपर नहीं उठ पाता… सो, हम रोते-हंसते जीवन काट देते हैं…

रोने में दुख महसूस होता है.. हंसने में सुख… हंसते वक्त दुख की आशंका लगी रहती है… दुखी होने के दौरान दुख बड़ा और असीमित लगता है…

निर्लिप्तता अदभुत है.. पर ये स्थिति सहज नहीं आ पाती है… हां, सहज रहने जीने से ज़रूर निर्लिप्तता की यात्रा शुरू हो जाती है…

निर्लिप्तता का भाव जग जाने पर सहजानंद की अवस्था आ जाती है… आंतरिक यात्रा की कई खिड़कियां खुलने लगती हैं…

निर्लिप्तता को पकड़ कर बैठना नहीं है… निर्लिप्तता से भी लिप्त नहीं होना है… तभी यात्राएं जारी रख सकेंगे… तभी अनुभव / बोध के नए माइलस्टोन पर पहुंच सकेंगे…

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