भरी जवानी में मर रहे मीडियाकर्मी! ऐसे में जीवन कैसे जिएं?

जीवन क्या है?

आना और जाना है। ये तो सब जानते हैं। पर आने जाने के दरम्यां आप महसूस क्या करते हैं, कैसा महसूस करते हैं, किस मनःस्थिति में जीते-मरते आते-जाते हैं, ये जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ये दो युवा साथी चले गए। एक हैं जगत, लखनऊ के तेजतर्रार फोटोजर्नलिस्ट हैं। दूसरे हैं सतीश, रांची के ब्यूरो चीफ, दैनिक भास्कर अखबार के।

एक की किडनी खराब थी। दूसरे को कैंसर था।

दोनों को पता चल गया था, मौत बेहद करीब है।

अंततः दोनों पर मौत ने चौबीस घण्टे के भीतर झपट्टा मारा और पीठ पर लादकर जाने कहाँ ले गई।

जीवन के हर अगले क्षण को जानने समझने की ज़रूरत है।

जीवन के हर पल को ठहर कर, गहरी लंबी सांस भर कर सहज भाव से जीने की ज़रूरत है।

दुनिया तो आपको उत्तेजित किए हुए है। किसिम किसिम की उत्तेजनाओं से भरे हुए है।

हम जीवन तभी सम्पूर्णता में जी पाएंगे जब दुनियावी उत्तेजनाओं से धीरे धीरे पिंड छुड़ा लिया जाए।

जीवन को इतना गहरे जियो समझो महसूसो कि मौत कोई अलग थलग परिघटना न लगे। जीवन के हर क्षण में ज़िंदगी मौत उत्सव दुख सन्नाटा शोर हर तरफ हर कण में दिखने लगे।

जियो ऐसे कि मरना मीठा लगे।

गोरख के शब्दों में- मरो ओ जोगी मरो, मरो मरन है मीठा…

खुद के होने का अर्थ सबके होने में महसूस कर सको।

जियो ऐसे कि भटक न मरो।

कबीर के शब्दों में- भटक मरो न कोई…

खुद के न होने को विजिबल/ दृश्य / व्यक्त के उस पार की अकथ दुनिया में देख सको।

इन दो नौजवानों को नई दुनिया, नई ज़िंदगी मुबारक!

मृत्यु के पार जीवन है।

जीवन के पार मृत्यु।

जो दोनों को सहज भाव से कुबूल कर गया, फिर शांत चित्त हो कर क्षण क्षण कण कण में समय शांति संघर्ष को बहते हुए देखने लग गया, वही तो असली प्यारा न्यारा दुलारा, प्रकृति का।

ऐसा व्यक्ति कबीर हो जाएगा… फिर यही गाएगा-

रहना नहीं देश बेराना है..

और

साधो ये मुर्दों का गांव…

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