कोई ले जाए पकड़ कर आदम जात से दूर…

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

तब बार-बार खटकने लगता है… मन कहता… कोई गंभीर गड़बड़ जरूर है…
इसी कारण निहित स्वार्थी मनुष्य, और मनुष्य केंद्रित बड़बड़ चहुंओर है…
इससे आगे जब सोचने को जाता हूं तो जाने क्यों आध्यात्मिक हो जाता हूं…
जाने कितना कुछ है ब्रह्मांड में.. जाने कितना कुछ अनदेखा अबूझ है…
जितना सुलझाया है हमने सब कुछ, उतना ज्यादा उलझा यहां सब कुछ…
इतना बड़ा विशाल वृहत्तर महासमुद्र महाआकाश महान सृष्टि में चुपचाप…
घटता बढ़ता मथता हंसता गाता रोता जाता आता जाने कैसे कैसे पदचाप…
कोई ले जाए पकड़ कर आदम जात से दूर… अनजानों के पास बहुत दूर
जहां न हो कोई बात न हो कोई दिन रात ना ही कोई सुख-दुख और साथ…

अक्सर यह जब खयाल आता है…
दिल-दिमाग में शोर बढ़ जाता है…

हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं
आदम जात की बात हो रही है…
हर तरफ केवल और केवल जाने क्यूं

आदम जात की बात हो रही है…

(एक अकथ अकविता)

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