एक ब्रम्हांड समेटे देह-मन रूपी इस नैनो डिवाइस को एकूरेट फ्रीक्वेंसी पर सेट करने में सफल हो गए तो…

जब जीवन निरुद्देश्य हो जाए तो सबसे ज्यादा आनन्द बिना सोचे समझे चलते जाने में है। लंबे सफर के बाद जब थक कर बैठ जाओ तो आनन्द बहुत मिलता है।

छोटे भाई विवेक के आदेशानुसार आज निमोना पकेगा। मटर लाकर छील दिए हम लोग।

कल पुस्तक मेले में दिन भर घुमक्कड़ी मस्ती की।

रात एक प्यारे मित्र रोहित सक्सेना भाई के आदेश पर उनकी महफ़िल में शरीक हुआ। देर रात घर आकर मटर वाली तहरी पकाए। देसी घी में लबेर कर थरिया भर खाए।

खुद को लेकर जब सोचना बंद कर दीजिए तो आप जीवन की नदी में प्राकृतिक प्रवाह की दिशा में स्वतः बहते चले जाते हैं, उस सुपर पावर रूपी महासमुद्र से मिलन के लिए जिसमें समा जाना हमारी सबकी डेस्टिनी है, मंजिल है। दुर्भाग्य से हम अपनी जिद, कामनाओं, महत्वाकांक्षाओं के चलते अपनी जीवन नदी को किसी नाले परनाले तालाब खायीं में गिराकर लुढका कर भटकाकर नष्ट कर डालते हैं।

कबीर तभी तो कहते हैं – भटक मरो न कोई….

जीवन शुरू ही तब होता है जब आप भटकना बन्द कर दें। जब खुद को चींटी कुत्ता बंदर कबूतर की तरह का एक जीव मानकर अतिरिक्त आकांक्षाओं / वासनाओं से मुक्ति पा लें।

यह मुक्ति बड़ी प्यारी है। बड़ी सुखकर है। बड़ी समृद्धशाली है।

ये जब मिल जाती है तो कुछ और पाने की चाह नहीं बचती।

पूरा शरीर सुगंध से भर जाता है। सारा संसार बिल्कुल ठीक ठीक चल रहा महसूस होता है। कहीं कोई अपूर्णता नहीं। कहीं कोई दुःख नहीं।

हमारा शरीर मन एक ब्रम्हांड है जिसके सुपर पॉवर हम खुद हैं।

हमें अपने ब्रम्हांड को कैसा बनाना है, किस ऊंचाई तक इवोल्यूट करना है, ये हम पर निर्भर है।

हम अगर खुद के ब्रम्हांड को मैनेज न कर पा रहें तो इस बाहरी ब्रम्हांड के रचयिता से शिकायत क्या !

जिस दिन हम एक ब्रम्हांड समेटे खुद के देह-मन रूपी इस टिनी/नैनो डिवाइस को एकूरेट पैरामीटर्स /एंगल /फ्रीक्वेंसी पर सेट कर पाने में सफल हो गए तो समझिए आप बाहरी ब्रम्हांड रूपी सैटेलाइट से कनेक्ट हो गए। फिर आपको अपने होने की सार्थकता समझ आएगी। आप फिर बहुत कुछ रिसीव करते रहेंगे जिसका सुख आप खुद महसूस कर पाएंगे। इस सुख को न लिख सकते हैं न बता सकते हैं न कह सकते हैं। ऐसी अवस्था के लिए ही कबीर लिखते कहते हैं –

आतम अनुभव ग्यान की, जो कोई पूछै बात।
सो गूंगा गुड़ खाइके, कहै कौन मुख स्वाद।।
जो गूंगे के सैन को, गूंगा ही पहचान।
त्यों ग्यानी के सुक्ख को, ग्यानी होय सो जान।।
लिखालिखी की है नहीं, देखादेखी बात।
दुलहा दुलहिन मिल गए, फीकी पड़ी बरात।।
जो देखै सो कहै नहिं, कहै सो देखे नाहिं।
सुनै सो समझावै नहीं, रसना दृग श्रुति काहि।।
भरो होय सो रीतई, रीतो होय भराय।
रीतो भरो न पाइए, अनुभव सोइ कहाय।।
ऐसो अ˜ुत मत कथो, कथो तो धरो छिपाय।
वेद कुराना ना लिखी, कहूं तो को पतियाय।।

जै जै
💐❤👏🏻

जब जीवन निरुद्देश्य हो जाए तो सबसे ज्यादा आनन्द बिना सोचे समझे चलते जाने में है। लंबे सफर के बाद जब थक कर बैठ जाओ तो…

Posted by स्वामी भड़ासानंद on Saturday, January 11, 2020
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