बंजारों-सी हस्ती, मुझे न तू संभाल…

बंजारों-सी हस्ती, मुझे न तू संभाल
प्रेम से भटकता हूँ, प्रेम में रुकता हूँ

हम तुम्हारे लिए राह बनाते गये
तुम हमें अकेला करते गये!

आइए, एक पैरा ओशो को सुनते गुनते हैं….

जैसा नहीं होना चाहिए वैसा ही हो रहा है, इसका नाम ही तो संसार है. राजधानी का अर्थ होता है जहां सब तरह के चोर, बेईमान, लुच्चे, लफंगे, चालाक, चार सौ बीस, उपद्रवी इकट्ठे हो गए हों. अंग्रेजी में राजधानी के लिए शब्द है, कैपिटल. कैपिटल बनता है कैपिटा से. कैपिटा का अर्थ होता है, सिर. जहां सिर ही सिर इकट्ठे हो गए हों, वह राजधानी है. मतलब, जहां हृदय से कुछ न होता हो. जहां हर चीज गणित से चलती है, तर्क से चलती है, खोपड़ी से चलती है. बुद्धि बड़ी कठोर है. गणित में कोई दया नहीं होती. जहां करुणा के कोई फूल नहीं खिलते…. (जीवन के पृष्ठ- ओशो)

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