आनंद कहीं भी आ सकता है… गुस्सा किसी पर भी आ सकता है…

आनंद– कहीं भी आ सकता है…

गुस्सा– किसी पर भी आ सकता है…

इन दोनों को पाने, आजमाने की चाहत से मुक्त लोग न नर होते हैं न जानवर, वे गाड पार्टिकल्स होते हैं.. जो कई बार विजिबिल तो कई बार इनविजिबिल होते हैं..

अपनी ऐसी तारीफ खुद करने वाले को हिंदी में आत्ममुग्ध कहते हैं और आत्ममुग्धता को हिंदी में बुरा माना जाता है और मैं बुरी चीजों में अक्सर अच्छे और इन्सपायरिंग एंगल तलाश लेता हूं ..

उसी तरह अच्छी चीजों में भरपूर बुराई को देख लेता हूं.. इस प्रकार आपके अच्छा और बुरा और आत्ममुग्ध मानने से मेरी सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता, और इससे भी नहीं पड़ता की आप मुझे भगवान मानते हैं या शैतान मानते हैं या महान मानते हैं या हैवान मानते हैं…

क्योंकि आपके मानने और न मानने से भी ब्रह्मांड की अपनी खुद की गति पर कोई खसर असर नहीं पड़ता, इसिलए उस गति के साथ लयबद्ध यशवंत पर भी कोई असर नहीं पड़ने वाला…

हां, ये यशवंत आपके हर अंदाज, काम, अंजाम पर मुग्ध है क्योंकि आपमें जो कुछ एक्सक्लूसिव है वह भी मेरे जैसा है और आपमें जो कुछ साधारण है वह भी मेरे जैसा है… सो, मेरा तुम्हारा ब्रह्मांड का जो कुछ है मिला जुलाकर वह सबका है और वह एक एक का है और वह कई बार अलग अलग लगता है तो कई बार इकट्ठा एक…

इसलिए भैंस पर लेटकर मोबाइल चलाओ या गुस्सा आने पर अपने से कई गुना बड़े से भी तुरंत भिड़ जाओ या फिर इन दोनों अवस्थाओं के ओर-छोर के अंत शुरुआत को ठीक से जान बूझ महसूस कर चुके होने के कारण पेड़ों फूलों पत्तियों के संग संग आप भी मुस्कराओ.. जय हो..

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