अब ये अक्सर लगने लगा है कि…

-वक़्त चलता है, हम ठहरे हुए होते हैं। पर लगता है जैसे हम चल भाग रहे हों और वक़्त तटस्थ-सा हमें देख निहार रहा हो।

-जीवन का कोई मकसद नहीं होता। मकसद लक्ष्य मंजिल नामक चीजें कपार में जबरन भरी गढ़ी जाती हैं।

-प्रकृति प्रदत्त जंगल राज के नियमों से ही धरती की अ-सभ्यताएं संचालित होती रही हैं और होती रहेंगी। सभ्यता जैसी बात मिथ है।

-हिंसा, विनाश, दुख प्रकृति की ड्राइविंग फोर्स है, मेनस्ट्रीम हैं। अहिंसा, सृजन और खुशी आदि रिएक्शन में उपजे भाव हैं, अल्पमत की चीजें हैं।

-जाग्रति, मोक्ष, एनलाइटमेन्ट जैसी अवस्थाओं में मूलतः हलका डिप्रेशन / हलका मौज का भाव लिए निरगुन तटस्थता को जीना होता है जिसे अक्सर सुख-दुख से निरपेक्ष रहना कह दिया जाता है।

-आपको भी कभी कभी कुछ कुछ लगता है क्या?

दोपहर की नींद

किसी असम्भव सी होती है दोपहर की नींद
दोपहर की नींद सम्भव बनाने के लिए
करना होता है त्याग
सब कुछ से विरक्त हो
खोजना पड़ता है अकेलापन
जगह रोशनी और शोर रहित
जाड़ों में रजाई और इच्छाशक्ति
दोपहर में सो लेने की

दोपहर में पहली बार कोई वैरागी सोया होगा
दोपहर में कम ही सो पाते हैं लोग
क्योंकि कम रह गए हैं आत्मसन्तोषी जीव

हम भी जब कभी दोपहर में सो लेते हैं तो
इसे एक बड़ा घटनाक्रम मान कविताई करते हैं

जैसे आज पहले फोन शांत किया
फिर खुद हुआ शांत
और घुस गया रजाई में
गहरी नींद आई दोपहर में

दोपहर की नींदें खत्म करने की साजिशों को पहचानिए
विकास तरक्की सत्ता सिस्टम काम कम्पनी को नफरत है
नींद से क्योंकि उनका वश चले तो रात में भी न सोने दें

ध्यान साधना को समझने वाले शुरआती संतों ने
पहले खुद को आलसी बनाया होगा
सोए होंगे खूब दोपहर में
बूझा होगा जीवन मर्म

रात में नींद न आने पर देखते होंगे आसमान
चांद सितारे अमावस पूर्णिमा सन्नाटे में भगवान

और कह दिया होगा, जीवन तो नींद में है
जीवन ध्यान में है, जीवन विश्राम में है

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