कुछ लोगों को लगने लगा है कि मैं बाबा संन्यासी आध्यात्मिक होने लगा हूं…

कुछ लोगों को लगने लगा है कि मैं बाबा संन्यासी आध्यात्मिक होने लगा हूं… अरे भाइयों, बाबा संन्यासी आध्यात्मिक तब बना जाए जब इस फील्ड में घुसकर मनमोहक वेष धर कर धंधा पानी करना हो…

आंतरिक यात्रा सब करते हैं, कई बेहोशी में तो कुछ होश में. आंतरिक यात्रा सब करते हैं, कई घोषित करके करते हैं, कुछ चुपचाप. आंतरिक यात्राएं हमारे चाहने न चाहने के बावजूद जारी रहती हैं, कभी तेज गति से, कभी सुप्त गति से.

आंतरिक यात्राएं कभी कभी मुख्यधारा बन जाया करती हैं जीवन की, वरना बाहरी यात्रा ही मुख्य धारा बनी रहती है. आंतरिक यात्रा के प्रति जब चैतन्य होकर सजग होकर एलर्ट होकर चाहत से भरकर देखने समझने लगते हैं तो नए रास्ते नए दृश्य नया संसार खुलता दिखता महसूस होता है वरना आंतरिक यात्रा की नदी सूखी कृपण उपेक्षित अकालग्रस्त बनी रहती है.

और ये कि, आंतरिक यात्रा जबरन स्पीड नहीं पकड़ सकती, यह खुद ब खुद होने लगता है, एक समय एक उम्र एक समझ एक चेतना के बाद.. सो, ये मत समझना कि बाहर की दुनिया पर नजर नहीं है. सब देख सुन रहा हूं जी. हरंम्पना जारी आहे 🙂

स्वामी भड़ासानंद यशवंत

August 30, 2015

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